सांखनी गाँव में "गुलामाने हैदरी 72" द्वारा आयोजित सभा बेहद क्रांतिकारी -

 इतिहास साक्षी है जब जब अत्याचारी प्रोपेगंडा शक्तियों को असफल बनाने के लिये भारतीय गाँव  आगे आये हैं तब तब अत्याचारियों को शिकस्त का सामना करना पड़ा है ऐसा एक दो बार नहीं बल्कि अनेकों बार देखने को मिला है 1857 के विद्रोह का इतना शक्तिशाली होना , कि जिससे ब्रिटिश शासन भयभीत हो गया , भारतीय ग्रामीण जनता की भागीदारी से ही संभव हो पाया था 

इसी तरह महात्मा गांधी द्वारा भी असहयोग और नागरिक अवज्ञा जैसे आंदोलन में भारतीय ग्रामीण समाज के योगदान पर ध्यान दिया गया , भारतीय ग्रामों से दुराचारी शक्तियों को मुंहतोड़ जवाब न केवल आज़ादी से पूर्व दिया गया है बल्कि आज़ादी के बाद भी ये प्रवृत्ति बरक़रार है , 

स्वतंत्र भारत में अनाज की कमी होने पर अमरीका ने भारत को दबाव में लेने का प्रयास किया था , ऐसे में देश के किसानों ने खून पसीना एक करते हुए भारत को अन्न आयातक देश से अन्न निर्यातक देश बना दिया , ये सारी घटनाएँ भारतीय ग्रामीण जनता की महानता का वर्णन करती हैं


आज भी भारतीय ग्राम दुराचारी शक्तियों के खिलाफ हैं और महान शख्सियतों के साथ दृढ़ता से खड़े हैं , इसी कड़ी में भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के ग्राम सांखनी में " गुलामाने हैदरी 72" द्वारा इमाम अली नकी  के पवित्र जन्मदिवस के अवसर पर ( 28 जनवरी 2023 ) को " जश्ने मासूमीन व् तहफ़्फ़ुज़  ए मरजईयत " नामक मज़मून से सभा का आयोजन किया गया है जिसमे भारत के योग्य  वक्ता अपने विचार प्रस्तुत कर रहे हैं ग्रामवासियों में आयोजन को लेकर काफी उत्साह देखने को मिल रहा है , बच्चों ने विशेषकर इसमें भागीदारी की !


ऐसे आयोजनों का उद्देश्य 14 मासूमीन की शिक्षाओं का प्रसार होता है इसमें शिया विद्वानों( मरजईयत) के साथ दृढ़ता से समर्थन दिखाया जा रहा है , जो वास्तव में कुछ वर्षों से प्रोपेगंडा मिशनरियो द्वारा फैलाए जा रहे असामाजिक वायरस को रोकने के लिये आवश्यक है 


दरसल दुराचारी शक्तियों ने इराक़ , सीरिया में शिया समुदाय का नरसंहार करके उनकी संस्कृति को तहस नहस करके स्वयं की सत्ता स्थापित करने की योजना बनाई थी , इन आतंकी संगठनों को बहादुर शिया जवानों द्वारा नाकाम बना दिया गया , इन जवानों का नेतृत्व शिया आलिमों ने किया था , ऐसे में स्वाभाविक ही इन आतंकियों में शिया आलिमों के प्रति कुंठा उत्पन्न होनी थी, 


बंदूक़ की लड़ाई में हार चुके आतंकियों ने अपनी कुंठा निकालने के लिये अपने कलम के एजेंटों को सक्रिय किया , जिन्होंने शिया आलिमों की छवि धूमिल करने का प्रयास किया , लेकिन ये आतंकी संगठन इस बात को भूल गए " भला जिसे अल्लाह इज़्ज़त दे उसे कोन ज़लील कर सकता है ? "


यूपी के ग्राम सांखनी में शिया आलिमों के सम्मान में हो रहा यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि जिस तरह पूर्व में शिया समुदाय अपने विद्वानों के प्रति सम्मान भाव रखता था वो आज भी अनवरत जारी है बल्कि रचनात्मकता के साथ समर्थन किया जा रहा है,


वास्तव में ऐसे आयोजनों का मासिक रूप से होना लाभकारी है जो जनमानस की चेतना का विस्तार करें  ,बधाई के पात्र हैं वो लोग, जो इसके आयोजनकर्ता हैं वो भी जो इसमें सम्मिलित होकर अपना योगदान दे रहे हैं ! 



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